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बालमन में समझ

कक्षा में देखा मैंने, कुछ ही छात्र पढ रहे हैं।
कुछ बैठे - बैठे यूँ ही, मूकदर्शक बन रहे हैं।

तब मैंने कहा उनसे, तुम बहुत कुछ कर सकते ।
मन में बिठालो ऐसा, कि सोचो राह चलते - चलते ।

हर क्षण हर घड़ी का उपयोग तुम भी कर लो।
ये लाएगा जीवन में अनमोल पल, तुम समझ लो ।

बालकपन की तीव्र बुद्धि, रुचि ज्ञान को बढ़ाओ।
मेरे प्रिय छात्र छात्राओं, मत व्यर्थ समय गँवाओ ।

लाएगा जब ये वक्त, मेहनत का फल व उजियारा।
होगा न्यौछावर ये जहाँ, खुश होगा जी तुम्हारा ।

बचपन का संचित ज्ञान, जब एकत्र हो दिखेगा ।
पग-पग राह में राही, बुद्धिजीवी बन चलेगा ।

कक्षा का ज्ञान छात्र शिक्षक, स्वयं की अर्जित उपलब्धि है।
प्रतिपल बढ़े सहज हो, उन्नति ही सरस अनुभूति है।

छात्रों का ज्ञान बढ़ा और शिक्षक की मेहनत रंग लाई ।
परिवर्तन देखा रुचि बढ़ी, परिणाम देने लगे दिखाई।

शिक्षक का अनुभव श्रेयस्कर, इसीलिए कि वो आदर्श बनें।
अपनी विद्वता का मापन, शब्दों में नहीं कक्षा में करें।

छात्रों की मासूमियत देख, इक रिश्ता सा बन जाता है।
कैसे क्या भर दूँ इनके मन बुद्धि में, विचार यह मेरे मन में आता हैं।

अपनी क्षमता इनकी क्षमता, विकसित करने में जाती है।
कुछ पढ़ें बढ़ें निज जीवन में, बस हमें खुशी हो जाती है।

मान बढ़े सम्मान बढ़े और नित - नित इनका मान बढ़ता।
जीवन मूल्य और नैतिकता अपनाकर, आए छात्रों में दृढ़ता ।

रचनाकार
श्रीमती नैमिष शर्मा  
सहायक अध्यापक
पूर्व माध्यमिक विद्यालय तेहरा   
वि०ख० मथुरा  
जिला- मथुरा

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