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बारिश की बूंदे

बारिश की बूंदे
बहुत कुछ समेट लाती है,
मेरे छुपे जज्बात जगा देती है, बूंदे।
समय का चक्र कुछ देर के लिये ही सही,
पर रोकने की कोशिश करती है, बूंदे।।
जैसे वीणा पर तार झंकृत हो,
तो गूंज जाता है सुर कोई नया।
वैसे ही तन को छू कर,
मन मे नया कोलाहल जगा देती है, बूंदे।।
कभी पुराने बचपन के दिनों में,
कागज की नाव पर मन सवारी करता है।
तो कभी अल्हड़ जवानी के दिनों की,
सैर करा देती है, बूंदे।।
बीमारी का खौफ दिखाकर माँ का डांटना,
पर बारिश के बाद हौले हौले मेरे सर को पोंछना।
सब कुछ फिर तरोताजा हो जाता है,
भिगाकर तन को मन को जीवंत कर जाती है बूंदे।।
गरम गरम पकौड़ियों के बीच,
पिता का हंसते हुए बारिश का पुराना किस्सा सुनना।
गम उदासी जीवन के झंझावात सब कुछ बहा कर,
जीवन को उल्लासित कर जाती है, बूंदे।।
कॉलेज से घर के रास्ते मे अब,
भीगता हूँ जब भी मैं।
पुरानी यादों में ले जाती है,
यूँ ही चेहरे पर मुस्कान ले आती है, बूंदे।।

रचयिता
अभिषेक द्विवेदी "खामोश"
प्राथमिक विद्यालय मंनहापुर
सरवनखेड़ा कानपुर देहात।

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