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हम शिक्षक

माना अपनी अभिव्यक्ति का, हमको है अधिकार नहीं।
पर अपने भावों का मर्दन, हमको भी स्वीकार नहीं॥

भावों का हम न करें प्रदर्शन, दुनिया ये बाज़ार नहीं।
दुखे हृदय जिन बातों से पर, वो अच्छा व्यवहार नहीं॥

मर्यादा में रहते हैं हम, करते हैं प्रतिकार नहीं।
सहनशील है हृदय हमारा, पर समझो लाचार नहीं॥

अन्याय नहीं हम सहते, औ' करते अत्याचार नहीं।
मन में साहस का पुट है, कर में कलम, 'तलवार' नहीं॥

शिक्षा देना काम हमारा, समझें हमको बेकार नहीं।
काम में अपने रहें समर्पित, हो कैसे नवाचार नहीं॥

भविष्य गढें जिन हाथों से, वो कोई कुम्हार नहीं।
दीप जले शिक्षा का फिर भी, रहे कहीं अंधियार नही॥

कर्तव्य निभाते सारे जब हम, मिलते क्यों अधिकार नहीं।
स्वप्न हमारा-पुरानी पेंशन, होता क्यों साकार नहीं॥

रचयिता
प्रीती वर्मा 'अनुप्रिया'
प्रा.वि.कुन्देरामपुर
अमौली, फतेहपुर

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