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अब हम आ गए शहर

बेटा मेरा एक साल का ,
है मगर बड़ा वह कमाल का,
आज सुबह जब आँख खुली तो,
उसको बैठा पाया ।
निहार रहा था खिड़की से ,
पर सूरज नजर न आया ।
मम्मी आई उसे उठाई,
रगड़ रगड़ कर नहलायी,
जब कंघी उलझी उसके बालों में,
वह उलझ गया खयालों में।

अब तो मैं बाहर जाऊँगा,
खुद उछल कूद मचाऊँगा।
फूलों को मैं तोड़ूँगा,
गमलों को मैं फोड़ूँगा।
डाँटेगी मम्मी सुन छोटे!
फूल बड़े प्यारे होते।
तब मैं उनको सीचूँगा,
फिर बछिया के कान मैं खींचूँगा।
बछिया जब दौड़ाएगी,
मम्मी मुझे बचाएगी।
बहुत किया शैतानी तू,
भूख लगी चल खाना दूँ।
तब गाय को रोटी डालूँगा,
फिर दादा के संग खा लूँगा।
बाहर धूप बड़ी होगी,
दरवाजे पर माँ खड़ी होगी।
खेलने नहीं तू जाएगा,
खाना खाकर सो जाएगा।

हो गई शाम बज गया चार,
आँगन अब होगा गुलजार।
मिट्टी में मैं खेलूँगा,
पूजा के बर्तन ले लूँगा।
कोई नहीं बंधन होगा,
मिट्टी में मेरा तन होगा।
मिट्टी चेहरे पर लग जाएगी,
मम्मी देख मुस्कुराएगी।
फिर ऊपर से गुस्साएगी,
मुझको आँख  दिखाएगी।
नल के नीचे ले जाएगी,
खूब रगड़ रगड़ नहलाएगी।

फिर कंघी निकली जब बालों से,
निकल पड़ा वह ख़यालों से।
खड़ा हुआ पर ठिठका ऐसे,
मानो पूछ रहा हो जैसे।

क्या सूरज नहीं निकलेगा?
गमले में फूल नहीं खिलेगा?
बछिया मुझको दौड़ाएगी कब?
गाय रोटी खाएगी कब?
तुम तो करती मुझसे प्यार,
फिर क्यों आज बजा न चार।

 प्रश्न गए चहुँओर बिखर,
माँ की ममता हुई निरुत्तर।
मैं भी एक पल हुआ अधीर,
आँखों में भरा आया नीर।
एक पल तो नजर न मिला पाया,
धीरज धरकर फिर समझाया,
यह नहीं  हमारे गाँव का घर ,
अब हम आ गए शहर।
अब हम आ गए शहर।।

रचयिता 
दुर्गेश्वर राय
सहायक अध्यापक
पूर्व माध्यमिक विद्यालय बलुआ
विकासखंड- उरुवा
जनपद- गोरखपुर
मोबाइल नंबर - 84 2324 5550


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