Breaking News

KHUNDEY KABAAB - उसी पुराने स्वाद की तलाश में.......

KHUNDEY KABAAB नाम तो सुना होगा –  आज चौथी दुनिया का यह लेख न जाने क्यूँ मेरे जेहन में आ गया मैंने सोचा आपको भी रूबरू कराते चलें इस स्वाद से जो आपने बहुत दिनों से नहीं चखा अब इसके कारण चाहें जो हो -
अपनी गौरवशाली ऐतिहासिक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि वाले उत्तर प्रदेश  की पहचान अदब, आदाब और कबाब से भी है।  हालांकि उत्तर प्रदेश  के कई और ठिकानों पर बढ़िया स्वाद वाले कबाब बनते हैं, लेकिन KHUNDEY KABAB का नाम भी स्वाद की तरह ही बिकता है। जहालत की जिंदगी जीने वाला भी इसके स्वाद में ही सुकून पा लेता था । पर इधर कुछ दिनों से KHUNDEY  का कबाब स्वाद के कारण नहीं बल्कि विवाद के कारण मशहूर होने लगा।  KHUNDEY KABAB के नाम को लेकर इतने दावेदार ताल  ठोंक कर सामने आ खड़े हो गए कि स्वाद ही कन्फ्यूज़ हो गया।  कबाब का स्वाद भी नुक्कड़ छाप होने लगा। विवाद का  यह मामला अदालत पहुंच गया। वह भी जिला कोर्ट नहीं, बल्कि ऊँची वाली अदालत में। 
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश  की पाँच और रायबरेली की एक दुकान को नकली करार देते हुए खान को ही असली KHUNDEY  कबाबी के परिवार का माना है।  बीते कुछ साल में शहर के अलग-अलग हिस्सों में मामूली कबाब की दुकानों पर भी KHUNDEY  कबाबी के नाम का इस्तेमाल शुरू हो गया था। इनमें से कुछ तो KHUNDEY  कबाबी के ननिहाल से ताल्लुक रखने का दावा भी करते थे। मोहम्मद खान का कहना है कि ये लोग बाहर से आने वाले पर्यटकों को निशाना बनाते थे, क्योंकि वे बोर्ड पर KHUNDEY  कबाबी लिखा देखकर सैकड़ों साल पुराना जायका लेने वहां चले जाते थे।
ऐसे ही एक दावेदार KHUNDEY  कबाबी ने इस नाम पर कॉपीराइट का दावा भी ठोंक दिया। तब बाकायदा कानूनी लड़ाई शुरू हो गई।  KHUNDEY  कबाबी के नाम से 30 - 35 आउटलेट हैं।  इसके अलावा उत्तर प्रदेश  में कोई भी आउटलेट KHUNDEY  कबाबी से सम्बद्ध नहीं है। अब उत्तर प्रदेश  वाले KHUNDEY KABAB की कोई नकली फ्रेंचाइजी नहीं खोली जाएगी।  खान ने कहा, मेरे पास KHUNDEY  का पेटेंट है, मैं पहले भी केस जीत चुका हूं। हमने उत्तर प्रदेश  के स्वाद को आगे बढ़ाया, पुरखों का नाम बढ़ाया, यही बहुत है।
अब दरअसल मामला क्या है मै समझाता हूँ  बीसवीं सताब्दी में दो दशक बीतने पर KHUNDEY KABAAB ने एक छोटी सी शुरुआत की धीरे - धीरे इसका स्वाद लोगों के बीच फैलता चला गया। इसके स्वाद का यह आलम था कि उत्तर प्रदेश का नाम आते ही लोगों के मुँह में KHUNDEY KABAAB का स्वाद आ जाता था।  दो  पीढ़ी बाद विवाद का दौर शुरू हुआ।  इनके एक बाबा जो थोड़े जानकार थे उन्होंने १९६६ के बाद व्यापार कर विभाग द्वारा इसे KHUNDEY KABAAB के नाम से रजिस्टर्ड करा लिया तभी से इसमें विवाद का दौर शुरू हो गया फिर नाम की लड़ाई चलती रही लेकिन स्वाद नहीं बदला इन्होने अगली पीढ़ी को आगे आकर कुछ नया नहीं करने दिया । तब परिवार में विद्रोह शुरू हुआ एक बाबा जो बहुत पहले से नाराज चल रहे थे उन्हें मौका मिला उन्होंने इस नाम को पाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन बुजुर्गों से सत्ता अब चौथी पीढ़ी के हाथों में आ पहुँची चौथी पीढ़ी के दो पटीदारों के बीच नए प्रयोगों के साथ जंग जारी रही।  इस बीच सब कुछ सलामत रहा सिवाय कबाब के उस लजीज स्वाद के जो सपने में भी दिख जाए तो अगले दिन की सुबह खुशनुमा लगने लगे।  अब मामला अदालत में था दोनों ही पटीदारों की दुकान अब फ्रैंचाइजी बन गई थी।  अपने जिले में फ्रैंचाइजी खोलने  के लिए अच्छी रकम जमा करनी पड़ती थी।  लेकिन दोनों   अपना अपना काम एक ही नाम KHUNDEY KABAAB से कर रही थी मामला कोर्ट में चल ही रहा था कोर्ट ने मामले को हल करने के लिए  वाणिज्य कर विभाग को दायित्व सौंपा।  अब विभाग के सामने  एक भाई का कहना था कि चूँकि मसाला मेरे दादा की देन है जिसके कारण KHUNDEY KABAAB इतना फेमस हुआ इसलिए इस नाम पर मेरा हक है।  लेकिन दूसरे पटीदार भाई का कहना था कि चूँकि रजिस्ट्रेशन प्रपत्र मेरे पास हैं और फ्रैंचाइजी की संख्या मेरी ज्यादा है, इस लिए इस नाम के प्रयोग का  हक केवल हमें मिलना चाहिए। वाणिज्य कर विभाग ने भी अधिक फ्रेंचाईजी वाले पाटीदार भाई को रजिस्ट्रेशन का रेनयूअल दे दिया। लेकिन इस निर्णय पर दूसरे पटीदार भाई का  मानना है कबाब को मशहूर तो कबाब के मसाले ने कराया था, वो मसाला जिसको उनके बाबा ने इजाद किया था। बस उसी से तो कबाब का स्वाद बढ़ा था इसलिए उसका हक कम नहीं हो जाता मसाला तैयार करने वाले बाबा भी उन्ही के साथ खड़े हैं यह निर्णय हमें मान्य नहीं है हम मामले को अदालत में ले जायेंगे।
रजिस्ट्रेशन मिलने के बाद खुशी जताते हुए एक भाई ने कहा अब चूँकि नाम हमें मिल गया है इसलिए हम अपने ग्राहकों को विशवास दिलाते हैं कि जल्द फिर से KHUNDEY KABAAB स्टोर पर आपको वही पुराना स्वाद मिलेगा।
इसी  १० वर्षों के विवाद के बीच    उत्तर प्रदेश में एक और कबाब स्टोर की फ्रैंचाइजी si ti special सिटी स्पेशल नाम से खुली उसका दावा था कि हम बेहतर स्वाद देंगे ग्राहकों को उन पर भरोसा करना चाहिए।  लेकिन उनका बिसनेस ट्रेंड थोडा अलग था उनका कहना था कि चूँकि हमारे यहाँ इलाहाबाद के प्रसिद्ध कबाब के कारीगर हैं इसलिए हमारी कास्ट बढ़ जा रही है। अतः  हम सभी दैनिक ग्राहकों को कबाब उपलब्ध नहीं करा सकते हम उन्ही को  स्वादिष्ट कबाब उपलब्ध करा पायेंगे जो हमारी आउट लेट si ti special सिटी स्पेशल के ताउम्र ग्राहक बने रहने का निर्धारित शुल्क जमा करेंगे।
आपने उ0प्र0 के इन कबाब व्यवसायियों की कहानी पढ़ी जिसे मैंने आपके बीच रखा। इन व्यवसायियों को सोचना पड़ेगा कि वह ग्राहक जो पुराने स्वाद के लिए लंबी कतार लगाकर लाइन में खड़े रहते थे, लेकिन वर्षों से उन्हें वह स्वाद आपसी विवाद के चक्कर में न मिल पाया अब उन ग्राहकों का विश्वास उठ गया है। और तो और आज की युवा पीढ़ी तो उस स्वाद को चख भी न पाई जिसके लिए सूबे के दूर – दूर तक चर्चे थे। वहीं पुराने स्वाद के चहेतों के बीच अब कौतूहल है कि क्या फिर हमें वह वर्षों पुराना वाला स्वाद मिल पायेगा। अब वक्त क्या गुल खिलाएगा ये तो उसे ही पता है। हाँ पर वहीँ  सिटी स्पेशल के ग्राहक शुल्क जमा करने के बाद भी मायूसी को ढो रहे हैं। दिल में यही पसोपेश चल रही है कि शुल्क तो दिया है लेकिन दिल में डर भी है कि क्या इसी शुल्क पर हमें आजीवन  यह स्वाद मिलता रहेगा और डर हो भी क्यों न आखिर खून – पसीने की कमाई का अंश जो दिया है।
इसलिए हमारी तो सभी को यही सलाह है कि जनाब नाम की फिक्र छोड़ो रजिस्ट्रेशन प्रपत्र की चिंता भी छोड़ दो। अच्छे मसाले का प्रयोग करो चाहें मसालों की रेसिपी के लिए उन्हें  अपने गले लगाना  पड़े लगाओ, विवाद खत्म कर अच्छा स्वाद वही पुराना वाला देना शुरू करो नहीं तो कबाब के लिए लाइन लगाने वाले तुम्हारे अपने ही होंगे न कि आम ग्राहक। कबाब बनाने वाले सभी नए - पुरानों को ये बात जेहन में उतार लेनी चाहिए कि गुलशन में भौंरे भी रसदार फूल पर ही बैठते हैं, ठूंठ पर तो मक्खियाँ भी न भिनभिनातीं।
डिस्क्लेमर :- लखनऊ के इस बन्दे की एक गुजारिश पर जरा गौर करिएगा । माना कबाब बड़ा लजीज होता है पर कबाब का रुआब किस ओर जा रहा है उस पर भी नजरें इनायत रखिएगा ।
कबाबे स्वाद कलियुगे ।
लेखक - आशुतोष मिश्र
फेसबुक पता
https://www.facebook.com/ashujkp

कोई टिप्पणी नहीं