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मंज़िलें खो गईं, रास्ता रह गया

मंज़िलें खो गईं रास्ता रह गया
एक राही कदम नापता रह गया
मीत लाखों मिले इस जहाँ में मगर,
प्रीत की रीत मैं, खोजता रह गया
नेकियाँ उठ गयीं, इस ज़माने से अब
बस फ़रेबों का इक सिलसिला रह गया
वक़्त यूं हाथ से बस फिसलता रहा
उम्र भर मैं खड़ा, देखता रह गया
साथ छोड़ा सभी ने बुरे वक़्त में
रू-ब-रू बस मेरे आइना रह गया
वो सियासत पकड़कर चढ़े अर्श पर
और मैं ईमां लिए सोचता रह गया
- पुष्पेन्द्र 'पुष्प'

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