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बिक गई माँ

बच्चा पैदा हुआ.... बेहोश हो चुकी माँ ने कुछ समय बाद दम तोड़ दिया... बेचारा बाप... माँ की अन्तिम यात्रा की तैयारी करे या फिर अपने नवजात की भूख का इन्तज़ाम.... ?

डॉक्टर साहब ने भी यह कहते हुये अपना पल्ला झाड़ लिया कि गाय का ही शुद्ध दूध... रुई के फ़ीहे मे भिगा कर बच्चे के मुँह पर रखो... क्योंकि उसे उचित पोषण उसी से मिलेगा... बेहतर तो होता कि इस बच्चे को इसकी माँ का दूध ही नसीब होता, लेकिन इस अबोध ने उसे जन्म लेते ही खो दिया ।

समय बीत गया...बाप ने दूसरी शादी भी कर ली.... वह नई माँ तो शायद कभी उसे अपना ही न सकी । बच्चे को माँ की ममता और दूध तो घर की गाय ने ही दिया था...जो तब भी पलंग पर पैर हिलाते उस बच्चे को कॉतर आँखों से देखती थी.... जब उसका अपना बछड़ा दूध पी रहा होता था ।कई बार तो उसकी आँखों मे नमी भी दिख जाती थी जब रोते हुये बच्चे पर कोई भी ध्यान नही देता था और वह करवट ले कर पलंग से ज़मीन पर गिर जाता था । चारे को खाते समय भी ... वो कई बार बच्चे की ओर मुड़-२ कर देखती थी... जैसे जानना चाह रही हो कि बच्चे ने कुछ खाया भी या नही.... ?

बच्चा बड़ा होता गया... और गाय बूढ़ी... फिर एक दिन गाय ने दूध देना भी बन्द कर दिया... और फिर इस बेकार हो चुकी गाय को उसके मालिक ने कुछ सिक्कों मे... कसाई के हाथ बेच दिया.. । जाते हुये भी ... वो बूढ़ी "माँ" भीगी आँखों से उस बच्चे को ही देखे जा रही थी...  शायद उसे पता था कि अब वो अपने बच्चे को दुबारा न देख पायेगी ... क्योंकि अब उसे टुकड़ों मे काट दिया जायेगा.... !!

(सुधांशु श्रीवास्तव)

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