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परसाद सुमंगल पाये


ऊधौ भइया.... बड़कू चाचा...
'सूरत' गये कमाये ...
चार बरस मे ढ़ेर कमाया....
तौ वापस घर आये....
ऊधौ भइया ...लगी लॉट मे
इक दिन बोले हमसे.....
रोड मा खेदौ मोटरसाइकिल...
आवै मजा ... कसम से....!
पर भइया... तुम हमे बताओ...
कँहा धरी है गाड़ी............. ?
हमे चलावै भी ना आवै.....
हम तो बड़े अनाड़ी.......
ई तो बहुतै आसानी से ....
जो चाहे... वो सीखै.....
बड़कू सीखेन.. चार दिनन मा...
हम सीखेन उनके पीछे....
कालै चलौ....शहेर से चल कै
गाड़ी तुम्हे देवाई.......
बहुत दिनन से कान खाये हैं....
छोटकू.... तुम्हरी भौजाई....
हम सोचेन के लगी लॉट मा....
भइया ..... बी सी मारेन.....
पै अगले दिन.... लाये गाड़ी
ठड़िया दिहिन मोहारेन.....
हमे घोराइन....! का हो छोटकू
बाहर आ कै दैखौ.....
कपड़ा डारौ.... चलो सिखाई...
टूटी साईकिल फेंकौ....
हम्मौ अपनी झोला-झण्डी
लै के पाछे भागेन.....
कसत चलायें भइया गाड़ी...
गौर से तीके लागेन....
कैसे वहिका कान उमेठेन...
फिर वा कैसे भागी....
हमका लागा... हमौ चलाई
हमरेव खुजरी जागी....
कान खुजावत...खीस निकारे
हम भइया से बोलेन...
हमरा नम्बर कबै लगइहो... ?
भइया चुप्पी तोड़ेन...
आओ छोटू बइठो आगे...
हम पाछे से साधब....
कान उमेठेव धीरे-धीरे...
हम साथे- साथे भागब.....
बइठ गयेन हम ..
फ़्रंट सीट पर....
नाक की सीध म देखा....
गोबर फेंके चली आ रही
हमरी आईटम रेखा.....
वहिका देखेन...
अउर जोश म ....
कस के कान मरोड़ेन...
उड़न खटोला बन गे गाड़ी....
भइया गाड़ी छोड़ेन....
फ़ुला के छाती....
अपना आईटम ....
हम कनखिन से देखा....
पेल दियेन हम सीधा गाड़ी....
जँहा खड़ी थी रेखा...
यहिके बादे.....
चार महीना ..
हम खटिया मा काटेन....
उधर सुमंगल...
हमरी रेखा
धीरे-धीरे पाटेन.....
जउनै दिन हम..
उठ के बैठेन....
वही दिना हम जाना....
आज सुमंगल की शादी है....
हमरा भी है खाना....
मन मा सोचेन....
य हीरो हांडा....
महरानिन के जाये...
गोड़ तुड़ाये परे रहेन हम....
परसाद सुमंगल पाये.....

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