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नन्ही शक्सियत

नन्ही शक्सियत
जिसे कहते हैं हम
आने वाला कल,
आज यहीं कहीं तो
खोया होगा ,
हम हाथ में लेकर
जुगनुओं को खोजते
उसका पता-ठिकाना
और रचते जाते हैं
फूल-पत्ती-मौसम-बहार
नफरत - प्यार के किस्से ,
नज़र उठती है तो दिखती
बड़ी - बड़ी कतारें
बस नहीं दिखते
तो वो अस्पष्ट अक्षर
जिन्हें खड़ा करके
हाशियों में
हम भूल जाते हैं
थमाकर
पत्थर सी जिंदगी
चबाने के लिए
दूध के दाँतों से
----- निरुपमा मिश्रा "नीरु "

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