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मेरे अपने

जब वह नज़दीक से गुजरे,
बरबस !
झुक गई नज़रें,
अब उठना नही चाहती थीं
क्योंकि
आभास था उन्हे
'अपनेपन' की कुटिलता का
कितनी ही बार हुआ था,
आघात पीठ पर,
अपनेपन की 'चादर' की आड़ से
फ़िर भी,
यह 'अपनत्व' का रिश्ता
बीते को भुलाना चाहता है,
किंतु अंतरमन जाग्रत है,
उसे पता है,
फ़िर उठेगी वही 'चादर'
फ़िर होगा आघात,
फ़िर कोई अपना ही होगा,
जिसने प्रथमतः छल किया था
अंततः छल लिया था,
मै भी ढ़ूढ़ता हूँ,
एक 'चादर'
पर 'अलग सी'
ख़ुद को छिपा लेने के लिये,
ताकि,
नज़रे छिपाने से बच जाऊँ,
उस कुटिल
'अपने' से
सत्यता जानता हूँ,
वास्तविकता पहचानता हूँ,
कि
सामने आ कर वह 'अपना'
फ़िर उसी 'कुटिलता चादर' को
ओढ़ लेगा,
मै फ़िर छला जाऊँगा,
अंततः चुपचाप ही
इस दुनिया से,
'चला जाऊँगा'  !!
(सुधांशु श्रीवास्तव)

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