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कल्मष धो लें


नदी नहीं यह गंगा केवल,
जीवन का आधार यही।
सदियों से इस धरती पर ये,
जग की तारणहार रही।
बहती है भारत में जैसे,
अमृत की कोइ धार बही।
गंग मलिन जो करता उसको,
प्यार नहीं अंगार चही।
गंगा के निर्मल जल सा हम,
अंतस से निर्मल हो लें।
कर्कशता सब त्याग आज हम,
प्यार भरी वाणी बोलें।
अवसर है संक्रांति मकर का,
प्यार फ़िज़ाओं में घोलें।
महापर्व पर महाकुम्भ में,
जीवन का कल्मष धो लें।




रचनाकार- निर्दोष दीक्षित
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लावणी छंद विधान- चार पंक्तियो का छंद जिसमें १६-१४ पर यति, पदांत में मात्रा सम्बन्धी कोई नियम नहीं होता, चारों पंक्तियों या दो-दो पंक्तियों में तुकांत।
ककुभ / कुकुभ छंद विधान - चार पंक्तियो का छंद जिसमें १६-१४ पर यति, पदांत में २ गुरु, चारों पंक्तियों या दो-दो पंक्तियों में तुकांत।
नोट- उपरोक्त रचना की प्रथम 4 पंक्तियाँ लावणी छंद तथा शेष कुकुभ छंद।

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