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कुण्डलिया छंद

माया के बाज़ार में, बहुरंगी हर चीज।
यूँ भटका मन बावरा, ज्यों ऊसर में बीज।।
ज्यों ऊसर में बीज, जगत में ठग बहुतेरे।
काम-क्रोध-मद-लोभ, सभी को रहते घेरे।
करिये तनिक विचार, जीव जग में क्यों आया।
यह संसार असार, सदा भटकाती माया।
- पुष्पेन्द्र यादव

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