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बाल पत्रिका:स्वरुप परिवर्तन की आवश्यकता

बाल मन कोरे कागज़ की तरह होता है जिसपर जैसी छाप दी जाएगी बच्चा वैसा ही आगे चलकर व्यव्हार करता है।इसलिए ये निहायत ही जरूरी है कि बच्चों के मन को जिन भी रंगो से रंगा जाए वे कलुषित न हों।बालक अपने परिवार, समाज ,वातावरण,देश-काल और परिस्तिथियों से ही निरंतर सीखता रहता है जिनका उसके  लिए सकारात्मक होना बहुत जरूरी है।इन सबका बालक के कोमल मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ता है।बालक चूँकि दुनिया से पहली बार परिचित होता है उसके लिए हर चीज नई होती है इसलिए वह हमेशा प्रश्नो से ही घिरा रहता है।इन प्रश्नो का जवाब वह परिवार समाज और अपने आस पड़ोस से प्राप्त करने की कोशिश करता है।ऐसा अक्सर होता है की बालक अपनी समस्त जिज्ञासाओं का उत्तर प्राप्त नहीं कर पाता ऐसे में 'बाल पत्रिकाएँ' अहम भूमिका निभाती हैं।       
        बाल पत्रिकाएं बाल मनोविज्ञान के आधार पर ,सुरुचिपूर्ण तरीके से ज्ञानवर्धक सामग्री को बच्चों के सामने पेश करती हैं।इनका उद्देश्य ही होता है बच्चों को बच्चों के स्तर पर जाकर सिखाना या सीखने की लिए प्रेरित करना।बाल पत्रिकाएं बच्चों के सीखने और जानने के लिए मनोवैज्ञानिक वातावरण तैयार करती हैं।इन पत्रिकाओं का उद्देश्य मुख्यतः मनोरंजन,ज्ञान और नैतिक मूल्यों की शिक्षा होता है।बाल पत्रिकाओं में विद्यमान नवीनता ,रोचकता,मनोरंजनात्मक शैली बालक की जिज्ञासा को शांत करने में सहायक होती हैं।        
       बच्चों के ज्ञान के लिए यूँ तो प्राचीन समय से ही लेखन होता रहा है(उदाहरण के लिए पंचतंत्र) किन्तु हिंदी में व्यवस्थित लेखन 'भारतेंदु हरिश्चन्द्र 'के समय से तब दिखने लगा जब उन्होंने 'बाल दर्पण'और 'बाल बोधनी' जैसी बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन करवाया ।इसके बाद तो जैसे बाल पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई।'छात्र हितैसी,'मॉनिटर',शिशु,'बालसखा',खिलौना',वानर','बालबोध','चकमक' 'पराग 'जैसी पत्रिकाओ ने बाल पत्रिका की मजबूत नींव रखने का काम किया।वर्तमान में तो बाल पत्रिकाओ की लंबी फेहरिस्त है जिसमें 'नंदन','नन्हे सम्राट','सुमन सौरभ','देवपुत्र','चम्पक','गुड़िया','बाल हंस','समय झरोखा' जैसी पत्रिकाएं बच्चों की पसंदीदा हैं।       
      पर खेद का विषय ये है कि  बाल पत्रिकाएँ भी इस प्रतियोगिता के दौर में बली चढ़ाई जा रहीं हैं।व्यवसायिक दृष्टिकोण के चलते पत्रिकाएं विज्ञापनों और धन उगाही का माध्यम बन रही हैं।सस्ती और निम्नस्तरीय सामग्री परोसकर पत्रिकाएं अपने दायित्व से मुक्त होना चाहती हैं।ऐसी सामाग्री बच्चों के लिए हानिकारक साबित हो रही हैं।इन सबके बीच पत्रिकाओं की अनियमितता और अल्पावधि तक ही प्रकाशन एक मुख्य समस्या बन गई है।यद्यपि वर्तमान में हज़ारों बाल पत्रिकाओं का प्रकाशन हो रहा है पर कौन सी पत्रिका कब दम तोड़ दे कह सकना मुश्किल है ।बाल साहित्य के जाने माने लेखक 'हरिकृष्ण देवसरे' की पत्रिका 'पराग' का भी यही हश्र हुआ।पराग ने अपनी मौलिकता और मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण के कारण पाठकों के बीच अपनी पैठ तो जमाई पर अंततः बंद हो गई जिससे बच्चों में काफी निराशा फ़ैल गई।इस तरह स्तरीय पत्रिकाओं का प्रकाशन बन्द हो जाना पाठको की निरंतरता को प्रभावित करता है और वे उकता कर पत्रिका पढ़ना ही छोड़ देते हैं जिससे बच्चों के साथ साथ बाल साहित्य दोनों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।इतनी भारी संख्या में पत्रिकाओं  का प्रकाशन बच्चों को भ्रमित करता है। पत्रिकाओं की संख्या के साथ साथ उनकी सामग्री का स्तर भी चिंता का विषय है।किसी दृष्टिकोण विशेष से बंधकर लिखी गई विषयवस्तु बच्चों के सोचने के दायरे को भी सीमित कर देता है।कभी कभी पत्रिकाएं राजनीतिक दबाव में भी पड़कर विषयवस्तु को दृष्टिकोण विशेष से बाँध देती हैं जो सरासर बच्चों के साथ अन्याय है।ऐसा करके वे अपने मूल उद्देश्य से भटक जाती हैं और बच्चों को भी गलत राह दिखाती हैं।       
      वस्तुतः आवश्यकता यह है कि लेखक ,संपादक और प्रकाशक अपने उत्तरदायित्व को समझे और लिखने व प्रकाशन के पूर्व यह समझ लें कि वे जो कुछ भी प्रकाशित करने जा रहे हैं वह हजारों  कोमल मनों को प्रभावित करेगा।अनगिनत पत्रिकाओ के प्रकाशन पर रोक भी लगाना ज़रूरी है इसके लिए प्रशासन को बाल पत्रिकाओं के लिए मानक तय कर देना चाहिए ,प्रकाशन से पूर्व अनुमति का प्रावधान और साथ ही मानकों पर खरी न उतरने वाली पत्रिका का प्रकाशन तत्काल बंद कर देना चाहिए। ऐसा करने पर संख्या तो नियंत्रित की ही जा सकती है साथ ही साथ सामग्री के स्तर में भी सुधार लाया जा सकता है।यह ध्यान देने योग्य बात है कि पत्रिकाएँ  राजनितिक दबाव से दूर रहे तो ही अच्छा है ।पत्रिकाओं को साधन बनाकर सभी अपना अपना हित साधना चाहते हैं और इसमें अंततः नुकसान उन अबोध बच्चों का ही होता है जो तमाम जिज्ञासाओं को लिए पत्रिकाओं को पढ़ते हैं।आवश्यकता इस बात की है कि ये बाल पत्रिकाएं स्थानीय ,राष्ट्रीय क्षेत्र तक ही सीमित न रहे बल्कि बच्चों को अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं और विविध सन्दर्भों से परिचित कराएं ।वर्तमान समय तकनीक आधारित है अतः बच्चे भी इस परिवर्तन से अछूते नही हैं।आजकल बच्चे भी टेक्नोसेवी हो गए है वे पहले के बच्चों की तरह लुका- छिपी नही खेलते विडियोगेम खेलते है, आई पैड पर पढ़ते हैं, ऐसे में पत्रिकाओं को अपने स्वरुप में भी परिवर्तन करना होगा पत्रिकाओ का ऑनलाइन संस्करण उपलब्ध् कराकर  उन्हें मुख्य धारा में लाया जा सकता है।पुस्तको से अधिक ई- बुक पढ़ने का क्रेज बढ़ रहा है अतः पत्रिकाओं के डिजिटलीकरण को नजरअंदाज़ नही किया जाना चाहिए।हलाकि इस क्षेत्र में  कुछ पत्रिकाओं ने प्रयास किया है किन्तु अभी और अधिक कार्य की आवश्यकता है ।याद रहे बाल पत्रिकाएं ज्ञान के अलावा बच्चों के मनोरंजन के लिए भी होती हैं अतः उनमें प्रस्तुत विषय पर पर्याप्त शोध होना चाहिए ।इसके लिए स्वयं बच्चों की मदद ली जा सकती है ।उनकी रुचियों ,ज्ञान के स्तर,अन्य आवश्यकताओं आदि का ज्ञान परिकल्पना के आधार पर नहीं बल्कि वास्तविक सर्वे के माध्यम से ज्ञात किया जा सकता है।ऐसा करके ही एक पत्रिका बाल पत्रिका के मानदंडों पर खरी उतर सकती है और अपने उद्देश्यों को पूर्णतया प्राप्त एक आदर्श बाल पत्रिका की श्रेणी में आ सकती हैं।

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